पर जमाना है बेगानों का,
न बेगाने कम हुवे है,
न लगे अरमान भरे-भरे,
क्या करे !
बोलबाला है बड़े घरानों का,
चर्चा है सिने तरानों का,
न हम रोशन से सिने सितारे है,
न हम अम्बानी के भाई चचेरे,
क्या करे !
देश है खज़ानो का,
जमाना है दीवानों का,
न खज़ाने तेरे व् मेरे है,
न दीवाने हुवे धीरे,
क्या करे !
अफ़साना है उलझनों का,
और जमाना है सपनों का,
न उलझने सुलझे,
न सपने पुरे संवरे,
क्या करे !
आनन्द दाधीच (बहड़), बेंगलुरु (c)

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